जम्मू कश्मीर की बदलती तस्वीर

जम्मू कश्मीर की बदलती तस्वीर


मीलों तक फैली झीलें, हरे भरे मैदान, खूबसूरत वादियों के लिए जाने जाना वाला जम्मू कश्मीर अशांति के लिए भी उतना ही सुर्खियों में बना रहा है. आज आतंकवाद, पत्थरबाजी, अलगाववाद कश्मीर की छवि के पोस्टर बन चुके है जबकि इससे अलग भी एक कश्मीर है जहाँ अमन पसंद लोग विकास की आस लगाए हुए हैं. इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूज़18 इंडिया का दिए इंटरव्यू में कहा था कि उभरते, विकसित होते कश्मीर की तस्वीर भी दिखाई जाए.
एक खास रिपोर्ट में न्यूज़18 इंडिया के टीम ने कश्मीर की विकास यात्रा की तस्वीर पेश की है. कश्मीर का ये सफर दिखता है कि कैसे अशांत कश्मीर में भी प्रगति की बुनियाद रखी जा रही है और कैसे विकास के सीमेंट से उन्नति में लोगों का भरोसा मजबूत हो रहा है. साथ ही कश्मीर की समस्याओं को लेकर जनता की सरकार से कितनी नाराज़गी है, यह भी इस सफर के दौरान सामने आया


प्रधानमंत्री मोदी ने जब भी कश्मीर को ढाई जिले की समस्या कहा था तो उनका मतलब था जम्मू कश्मीर के तीन क्षेत्र. जम्मू, कश्मीर और लेहलद्दाख। राज्य में कश्मीर हमेशा ही सुर्खियों में रहता है. यहां सबसे ज्यादा सरकारी फंड खर्च होता है लेकिन बाकी के दो हिस्सों की जनता को लगता है कि सरकार को उसका ख्याल नहीं है. 
जम्मू क्षेत्र


यहाँ पाकिस्तान के साथ सरहद लगती है। इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सीमा भी है और लाइन ऑफ कंट्रोल भी है।इस इलाके की सबसे बड़ी परेशानी है पाकिस्तान की ओर से होने वाली गोलाबारी है। अंतरराष्ट्रीय सीमा और लाइन ऑफ कंट्रोल के नजदीक बसे गांवों में सरकार की योजना हर घर में एक बंकर बनाने की है ताकि फायरिंग के दौरान लोग सुरक्षित भी रहें और अपने घर भी ना खाली करने पड़ें. सीमावर्ती इलाकों में करीब 14 हजार बंकर बनाने की योजना है जब की करीब 2000 बंकर बन भी चुके हैं.
सीमावर्ती इलाकों और एलओसी के नजदीक बसे गांवों में बंकर लोगों की लाइफ लाइन बन गए हैं। अब फायरिगं शुरु होते ही ये गांव वाले अपने अपने घरों में बन चुके बंकरों में चले जाते हैं। हालांकि सीमावर्ती इलाकों में गोलाबारी से पशुओं को मारे जाने पर 50 हजार रुपये दिए जाने का प्रावधान है और फसल खराब होने पर मुआवजा भी दिया जाता है लेकिन इस योजना का फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है।


एक बेहतर कल और उभरते कश्मीर की बुनियाद रखते हुए पुलवामा जिले के अवंतीपुरा के साथ साथ जम्मू में भी एम्स की बुनियाद रखी जा चुकी है. ं
कश्मीर क्षेत्र


भारत सरकार ने श्रीनगर को स्मार्ट सिटी योजना में शामिल किया है. यहाँ पर मेट्रो ट्रेन चलाने की तैयारी तेज़ी से की जार ही है. श्रीनगर मेट्रो की कुल लंबाई 54 किलोमीटर होगी. कश्मीर के लोग कहते हैं कि मेट्रो के आने से उनके शहर की तस्वीर और उनकी तकदीर बदलेगी, लेकिन अशांति से छुटकारा कब मिलेगा?
श्रीनगर राज्य का वो शहर है जिसकी पहचान राज्य की राजनीतिक, सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर है. लेकिन इसी राजधानी से बरसों पहले आतंकवाद के चलते कश्मीरी पंडितों को विस्थापित होना पड़ा था. हाल ही में कश्मीर छोड़ कर चले पंडितों को वापस कश्मीर लाकर बसाने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार की 6 हज़ार कश्मीरी पंडितों को मकान और सरकारी नौकरी देने की योजना है. 2017 से पंडितों के मकान दिए जाने के काम में तेजी आई है. सरकार के प्रयास है कि विस्थापित कश्मीरी पंडितों को वापस लाया जाए, लेकिन जो मौजूदा मकान हैं उनको सुधारने की जरूरत है. घाटी में दस कॉलोनियों में कुल 6000 परिवार बसाने का लक्ष्य अभी अधूरा है
कश्मीर की इस विकास यात्रा में विस्थापितों को बसाने के प्रयास है तो नागरिकों को बेहतर सुविधाएं देने की बुनियाद भी रखी जा रही है। एम्स के अलावा कश्मीर में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट भी बनाने की तैयारी है।


केसर भी कश्मीर की एक खासी पहचान है. इसी केसर को दुनियाभर में मशहूर बनाने के लिए एक खास संस्थान खोला गया है. इंडिया इंटरनेशनल कश्मीर सैफरन ट्रेनिंग सेंटर विश्व में इकलौता केंद्र है जहां केसर पर शोध किया जाता है। अक्टूबर के महीने में जब केसर की फसल आएगी तब से यह संस्थान काम करना शुरू करेगा। इस संस्थान से पुलवामा, बड़गांव,  श्रीनगर और जम्मू के किश्त वाड़ में केसर किसानों को बहुत बड़ी सहूलियत मिलेगी।केसर पर शोध करने के लिए यहां आधुनिक मशीनें लगाई गई हैं. कश्मीर के केसर की गुणवत्ता और सर्टिफिकेशन के बाद उसे दुनिया भर में बेचा जा सकेगा और किसान बिचैलियों से बच सकेंगे।


लेह लद्दाख
कश्मीर की खूबसूरत वादियों में बड़े प्रोजेक्ट तैयार हो रहे हैं, लेकिन हिमालय के उस हिस्से का क्या हाल है जहां भूरे पठार हैं, जहां राज्य की 2 फीसदी आबादी दुर्मग इलाकों में रहती है. पहले श्रीनगर से लेह लद्दाख का बजट जारी होता था और विकास कार्यों के लिए इजाजत मिलती थी. लेह लद्दाख के लोगों को शिकायत है कि कश्मीर के लिए ही सरकारी नीतियां बनतीहैं अब लद्दाख को अलग डिवीजन बनाने का सरकार ने फैसला लिया गया है. हाल ही में लेह में कई परियोजनाओं का ऐलान हुआ है. यहाँ 7500 मेगावाट का सोलर पावर प्लांट बनाने की योजना है. साथ ही साथ इस क्षेत्र में 10 नए टूरिस्ट जोन विकसित करने पर भी काम चल रहा है. यहाँ पर करगिल एयरपोर्ट अपग्रेड किया  जा रहा है और मनाली-लेह रेल परियोजना शुरू कर दी गयी है. 


कश्मीर में अब विकास का पहिया पहले से तेज घूम रहा है।तीन क्षेत्रों में बंटे प्रदेश के दो उपेक्षित क्षेत्रों को लगता है कि अब उन की ओर भी ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन कश्मीर में जनता अब भी यही कहती है कि सरकार कश्मीर की बेहतरी के लिए सही कदम नहीं उठा रही है

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