अंधविश्वास की त्रासदी में फंसा देश

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जिस दिन विज्ञान की दुनिया में 'चंद्रयान-2Ó के सफल प्रक्षेपण के रूप में देश ने बड़ी उपलब्धि हासिल की, उसी दौरान झारखंड से अंधविश्वास की वजह से चार लोगों को बर्बरता से मार डालने की परेशान करने वाली खबर आई। राज्य में गुमला जिले के सिसकारी गांव में दो महिलाओं सहित चार बुजुर्ग आदिवासियों को लोगों ने इसलिए पीट-पीट कर मार डाला क्योंकि किसी तांत्रिक या ओझा ने उन्हें 'डायनÓ बता दिया। इसके अलावा, पिछले हफ्ते झारखंड के ही गिरिडीह में दो महिलाओं सहित तीन लोगों को मानव मल खाने पर मजबूर किया गया। दोनों ही घटनाओं के सामने आने के बाद पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है। ऐसे मामलों के तूल पकडऩे के बाद इस तरह की कार्रवाइयां पहले भी होती रही हैं। सवाल है कि उनका हासिल क्या है? आमतौर पर ऐसी हर घटना के बाद कानून अपना काम करता है और आरोपियों को गिरफ्तार करके कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाती है। मुश्किल यह है कि सोच-समझ व मानसिकता में गहरे पैठी जड़ताओं से जुड़ी इस समस्या की मूल वजहों को दूर करने की कोशिश नहीं की जाती है।


झारखंड में हुई ये घटनाएं कोई नई नहीं हैं। 'डायनÓ होने के अंधविश्वास की वजह से इस तरह किसी को मार डाले जाने या मानव मल खिलाने के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं। इस पर काबू पाने के मकसद से सख्त कानूनी प्रावधान भी किए गए, लेकिन आज भी अगर यह अंधविश्वास बदस्तूर कायम है तो यह न केवल कानून लागू करने वाली एजेंसियों की नाकामी भर है, बल्कि इससे यह भी साबित होता है कि विकास की चमकती तस्वीर में सामाजिक जड़ताओं की जंजीरों को तोडऩे के मुद्दे किस तरह दरकिनार हैं। सिसकारी गांव में कुछ लोगों की बीमारी की वजह से मौत हो गई थी। लोगों को लगा कि गांव को किसी की बुरी नजर लग गई है और इस मुद्दे पर बाकायदा एक सभा या पंचायत की बैठक की गई और किसी ओझा से संपर्क किया गया। फिर उसी की सलाह के बाद मामला यहां तक पहुंचा कि गांव वालों ने चार लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी। गिरिडीह में भी तीन लोगों को मानव मल खिलाने के पीछे ठीक इसी तरह का अंधविश्वास है।


इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह के अंधविश्वासों के बने रहने के पीछे मुख्य वजह अशिक्षा और गरीबी है। अभाव के बीच अशिक्षा की हालत में लोग इतना भी समझ पाने में सक्षम नहीं होते कि अगर कोई व्यक्ति बीमार है तो उसे डॉक्टर से इलाज कराने की सख्त जरूरत है। कई स्तर पर आधुनिक तकनीकी दूरदराज के इलाके में पहुंच जाती है, बदहाल स्कूलों में कभी किताब की शक्ल में शायद विज्ञान भी पढ़ा दिया जाता हो, लेकिन चेतना के स्तर पर सोच में बदलाव लाने और वैज्ञानिक दृष्टि के विकास की कोशिश नहीं होती। यह बेवजह नहीं है कि न केवल झारखंड या दूरदराज के इलाकों, बल्कि शहरों में भी 'डायनÓ या फिर भूत-प्रेत जैसी अंधविश्वास पर आधारित धारणाएं लोगों के बीच जड़ें जमाए रहती हैं। यह वैज्ञानिक सोच के अभाव का नतीजा है कि स्थानीय स्तर पर ओझा-तांत्रिकों का जाल फैला हुआ है और अंधविश्वास समाज के कमजोर तबकों के लिए त्रासदी साबित हो रहा है। सवाल है कि लंबे समय से गंभीर समस्या के रूप में कायम रहने के बावजूद सरकार को इस पर काबू पाने के लिए ठोस व कुछ साहसपूर्ण कदम उठाने की जरूरत क्या इसलिए महसूस नहीं होती कि इन अंधविश्वासों की मार सहने और मरने वाले लोग समाज के बेहद कमजोर तबके से आते हैं?


याद होगा कि महिलाओं के चोटी काटने की अफवाह राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली से फैलकर अन्य राज्यों के सुदूर इलाकों तक पहुंच गई थी और इस अफवाह की वजह से झारखंड में एक महिला की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। देखा जाए तो इंसान का दिमाग एक विचित्र-सी चीज है। हम जो कुछ भी देखते-समझते हैं, इसमें काफी सारे पेच होते हैं, जो देखने-समझने से जुड़े आचरण का निर्माण करते हैं। हमारे दिमाग में अंधविश्वासों का पुलिंदा भरा हुआ है। यही वजह है कि आज विज्ञान का युग होने के बावजूद भी हमारे समाज में अंधविश्वास हावी है। साल-दो-साल या फिर पांच-दस साल में अजीब सी कोई चीज या घटना आ ही जाती है, जो हमारे जनमानस के अंधविश्वास को बढ़ावा देती है। कभी मुंहनोचवा तो कभी चोटीकटवा की घटनाएं उसी अंधविश्वास का ही परिणाम हैं। इन सबके पीछे गहरे स्तर पर सामाजिक परिस्थितियां क्या होती हैं, इसके लिए राजनीतिक परिस्थितियां कितनी जिम्मेदार हैं, अंधविश्वास का अस्तित्व क्या है, इसमें किसी व्यक्ति या समूह की कितनी शरारत है, इन सब पर एक अध्ययन की जरूरत है, क्योंकि ऐसी घटनाओं के होने के ठोस कारणों के बारे में कुछ कह पाना उचित नहीं होगा। 
हम आज विज्ञान और तकनीक के मामले में तरक्की के रास्ते पर हैं। विज्ञान ने बहुत से गंभीर रहस्यों को खोज निकाला है, फिर भी समाज में अंधविश्वास हावी दिखता है। इसकी वजह भी यही है कि हम वैज्ञानिक तरीके से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। इसमें हमारी शिक्षा व्यवस्था और समाज की खामी है कि वह अपने बच्चों को वैज्ञानिक शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं। हम विज्ञान और तकनीक की चकाचौंध को स्वीकार तो करते हैं, लेकिन खुद वैज्ञानिक तरीके से अपनी जिंदगी नहीं गुजारते। वैज्ञानिकता का हमारा स्तर बढ़ नहीं पाता है। यही वजह है कि कभी-कभार हमारे समाज में चोटीकटवा जैसी घटनाएं समाज की दशा और दिशा को प्रभावित करने लगती हैं। फिर चाहे जमीन में गड़ी मूर्ति अचानक प्रकट हो जाती है या फिर अचानक किसी और जगह मूर्ति पैदा हो जाती है। उसके बाद तो वहां धीरे-धीरे चबूतरा बन जाता है, जो आगे चलकर देवस्थान का रूप धारण कर लेता है। इसी बीच समाज की कुछ शक्तियां इसे बाजार में परिवर्तित कर देती हैं और लोगों की भोली-भाली संवेदनाओं से खेलने लगती हैं। जहां तक इसको बढ़ाने में धर्म और आस्था का हाथ होने का सवाल है, तो धर्म की आड़ में अंधविश्वास को फैलाने में काफी मदद मिलती है। 


चूंकि धर्म और आस्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकता और न ही उसका विरोध किया जा सकता है, इसीलिए धर्म की आड़ में अंधविश्वास को बढ़ावा मिलने लगता है। हमारे समाज में ऐसी स्थिति न पनपने पाए, इसके लिए बेहद जरूरी है कि शिक्षा व्यवस्था को वैज्ञानिक पद्धति वाला बनाया जाए, ताकि लोग अपने जीवन में वैज्ञानिक आचरण करने लगें। सिर्फ वैज्ञानिक आचरण ही अंधविश्वास को खत्म कर सकता है। हमारे संविधान में यह दर्ज है कि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाएं। इसलिए जरूरी है कि अपने कर्तव्यों का वैज्ञानिक आचरण के साथ पालन करें। जब ऐसा संभव नहीं हो पाता है, तभी हम भ्रम में आकर अंधविश्वासों पर यकीन करने लग जाते हैं और अंधविश्वासों के बाजार का शिकार हो जाते हैं। अंधविश्वासों को दूर करना है, तो शिक्षा व्यवस्था को वैज्ञानिक शिक्षा के रास्ते आगे बढ़ाना होगा।


लेखक- सिद्धार्थ शंकर


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